केदारखंड में विवेकानंद जी

हिमालय दुनिया भर के आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिये एक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।। इसी क्रम में स्वामी विवेकानंद जी भी हिमालय की यात्रा की ओर निकल पड़े।। हिमालय की कल्पना भी उनके लिए किसी रोमांच से कम नहीं थी।। स्वामी गम्भीरानंद द्वारा लिखित स्वामी विवेकानंद की जीवनी 'युग नायक विवेकानंद के अनुसार, स्वामी जी की उत्तराखंड की यात्रा कोई सहज न थी किन्तु हिमालय के दिव्य आकर्षण ने उनको मार्ग की विघ्न बाधाओं की उपेक्षा करने को बाध्य कर दिया था।। 

अगस्त 1890 को वे अल्मोड़ा पहुँचे।। वे पद-यात्रा के बाद हिमालय के दिव्य दर्शन से ही अभिभूत थे। स्वामी विवेकानंद जी का कहना था कि हिमालय से मिलना और उसके साथ समय व्यतीत करना - यह मेरी कामना है।। अल्मोड़ा में कुछ महीने रहने के बाद स्वामी विवेकानंद जी ने 5 दिसम्बर 1890 को गढ़वाल के लिए प्रस्थान किया इस यात्रा में स्वामी श्रद्धानंद ,स्वामी अखंडानंद और स्वामी वैकुंठानंद भी उनके साथ थे।।

वे गढ़वाल भ्रमण के दौरान बदरीनाथ जी और केदारनाथ जी के दर्शन करना चाहते थे लेकिन कर्णप्रयाग पहुँच कर उन्हें पता चला कि इस क्षेत्र में अकाल के कारण यात्रा रोकी गई है, दर्शन न कर पाने के कारण वो दुखी हुए।।उसके बाद विवेकानंद जी रुद्रप्रयाग होते हुए श्रीनगर, गढ़वाल आये।। श्रीनगर में वे लगभगएक महीने तक रहे। वो यंहा अलकनंदा के तट पर ध्यान किया करते थे यहाँ उन्हें ग के पावन तट पर दिव्यत्व की अनुभूति हुई।। सर्दियों में अखंडानंद जी के अस्वस्थ होने के कारण विवेकानंद जी टिहरी चले गए।। कुछ समय टिहरी में रहने के बाद वो देहरादून को चले गए।।

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