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माँ कुंजापुरी शक्तिपीठ

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52 शक्तिपीठों में से एक मां कुंजापुरी देवी का मंदिर उत्तराखंड में टिहरीगढ़वाल जिले में नरेंद्रनगर के पास स्थित है।। हाल ही में मुझे भी माँ कुंजापुरी के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।। यह शक्तिपीठ आदिगुरु शंकराचार्य जी द्वारा टिहरी जिले में स्थापित तीन शक्ति पीठों (सुरकंडा, चंद्रबदनी, कुंजापुरी) में से एक है।। पर्वत की चोटी पर स्थित माँ के मंदिर के चारों ओर प्रकृति की सुंदर घाटियां नजर आती हैं।। पौराणिक कथा!! पुराणों के अनुसार जब राजा प्रजापति दक्ष के अपने घर पर  हवन का आयोजन किया था तो उस हवन यज्ञ में माता सती ने अपने स्वामी शिवजी का स्थान न देख कर यज्ञकुण्ड में माता सती प्राण त्याग देती हैं।। माता सती के जलते हुये शरीर को देखते हुये भगवान शिव अपना उग्र रूप धारण कर माता सती के जलते हुए शरीर को लेकर हिमालय की ओर निकल पड़े, शिव के क्रोध को शांत करने और सृष्टी को बचाने के लिए भगवान् विष्णु ने शिवजी द्वारा ले जा रहे माता सती के शरीर को सुदर्शन चक्र से काट दिया जिससे माता सती के अंग विभिन्न पहाड़ियों पर गिर गए ।। इस प्रकार माता का वक्षभाग (कुंज) उत्तराखंड के टि...

केदारखंड में विवेकानंद जी

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हिमालय दुनिया भर के आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिये एक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।। इसी क्रम में स्वामी विवेकानंद जी भी हिमालय की यात्रा की ओर निकल पड़े।। हिमालय की कल्पना भी उनके लिए किसी रोमांच से कम नहीं थी।। स्वामी गम्भीरानंद द्वारा लिखित स्वामी विवेकानंद की जीवनी 'युग नायक विवेकानंद के अनुसार, स्वामी जी की उत्तराखंड की यात्रा कोई सहज न थी किन्तु हिमालय के दिव्य आकर्षण ने उनको मार्ग की विघ्न बाधाओं की उपेक्षा करने को बाध्य कर दिया था।।  अगस्त 1890 को वे अल्मोड़ा पहुँचे।। वे पद-यात्रा के बाद हिमालय के दिव्य दर्शन से ही अभिभूत थे। स्वामी विवेकानंद जी का कहना था कि हिमालय से मिलना और उसके साथ समय व्यतीत करना - यह मेरी कामना है।। अल्मोड़ा में कुछ महीने रहने के बाद स्वामी विवेकानंद जी ने 5 दिसम्बर 1890 को गढ़वाल के लिए प्रस्थान किया इस यात्रा में स्वामी श्रद्धानंद ,स्वामी अखंडानंद और स्वामी वैकुंठानंद भी उनके साथ थे।। वे गढ़वाल भ्रमण के दौरान बदरीनाथ जी और केदारनाथ जी के दर्शन करना चाहते थे लेकिन कर्णप्रयाग पहुँच कर उन्हें पता चला कि इस क्षेत्र में अकाल के कारण यात्रा रोकी...

रम्माण: एक सांस्कृतिक धरोहर

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रम्माण उत्तराखंड के चमोली जिले के सलूड़ गांव में प्रतिवर्ष अप्रैल मेंआयोजित होने वाला उत्सव है। इस गांव के अलावा डुंग्री, बरोशी, सेलंग गांवों में भी रम्माण का आयोजन किया जाता है। इसमें सलूड़ गांव का रम्माण ज्यादा लोकप्रिय है। इसका आयोजन सलूड़-डुंग्रा की संयुक्त पंचायत करती है। रम्माण मेला कभी 11 दिन तो कभी 13 दिन तक भी मनाया जाता है। यह विविध कार्यक्रमों, पूजा और अनुष्ठानों की एक शृंखला है। इसमें सामूहिक पूजा, देवयात्रा, लोकनाट्य, नृत्य, गायन, मेला आदि विविध रंगी आयोजन होते हैं। इसमें परम्परागत पूजा-अनुष्ठान तथा मनोरंजक कार्यक्रम भी आयोजित होते है। यहभूम्यालदेवता के वार्षिक पूजा का अवसर भी होता है एवं परिवारों और ग्राम-क्षेत्र के देवताओं से भेंट करने का मौका भी होता है। रम्माण क्या है.......  उत्सव उत्तराखंड के चमोली जिले के सलूड़ गांव मेंप्रतिवर्ष अप्रैल में आयोजितहोता है। इस गांव के अलावा डुंग्री, बरोशी, सेलंग गांवों में भी रम्माण का आयोजन किया जाता है। इसमें सलूड़ गांव कारम्माण ज्यादा लोकप्रिय है। इसका आयोजन सलूड़-डुंग्रा की संयुक्त पंचायत करती है। रम्माण मेला कभी 11...